माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश (MPBSE) सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान (भाग 1 एवं 2) की नवीन अंक योजना, AI-संचालित सरल नोट्स, समसामयिक विश्लेषणात्मक प्रश्नोत्तर और मॉडल पेपर यहाँ से देखें।
माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 12वीं बोर्ड परीक्षा की आधिकारिक अंक योजना (Blueprint) जारी कर दी गई है। राजनीति विज्ञान में समकालीन वैश्विक राजनीति और स्वतंत्र भारत के राजनीतिक घटनाक्रमों का विश्लेषणात्मक अध्ययन आवश्यक होता है। सटीक उत्तर लेखन और अवधारणात्मक स्पष्टता से विद्यार्थी इस विषय में उत्कृष्ट अंक अर्जित कर सकते हैं।
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कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान
सम्पूर्ण सरल नोट्स एवं अभ्यास प्रश्नोत्तर
माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश, भोपाल | हायर सेकेण्डरी परीक्षा सत्र 2026-27
पूर्णांक — 80 | समय — 3:00 घंटे
अंक योजना — एक नजर में
| भाग | अध्याय | आवंटित अंक |
भाग-1 समकालीन विश्व राजनीति | 1. दो ध्रुवीयता का अंत | 07 |
| 2. सत्ता के समकालीन केन्द्र | 06 |
| 3. समकालीन दक्षिण एशिया | 05 |
| 4. अंतर्राष्ट्रीय संगठन | 07 |
| 5. समकालीन विश्व में सुरक्षा | 05 |
| 6. पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन | 06 |
| 7. वैश्वीकरण | 04 |
भाग-2 स्वतंत्र भारत में राजनीति | 1. राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ | 06 |
| 2. एक दल के प्रभुत्व का दौर | 03 |
| 3. नियोजित विकास की राजनीति | 03 |
| 4. भारत के विदेश संबंध | 07 |
| 5. कांग्रेस प्रणाली — चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना | 03 |
| 6. लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट | 07 |
| 7. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ | 07 |
| 8. भारतीय राजनीति — नए बदलाव | 04 |
| कुल | 80 |
सबसे अधिक अंक वाले अध्याय: दो ध्रुवीयता का अंत, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, भारत के विदेश संबंध, लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट तथा क्षेत्रीय आकांक्षाएँ — 7-7 अंक।
परीक्षा प्रश्न संरचना
| प्रश्न | प्रकार | कुल प्रश्न | प्रति प्रश्न | कुल अंक |
| 1 | सही विकल्प | 06 | 1 | 06 |
| 2 | रिक्त स्थान | 06 | 1 | 06 |
| 3 | सत्य/असत्य | 06 | 1 | 06 |
| 4 | सही जोड़ी | 07 | 1 | 07 |
| 5 | एक वाक्य में उत्तर | 07 | 1 | 07 |
| 6–15 | लघु उत्तरीय | 10 | 2 | 20 |
| 16–19 | मध्यम उत्तरीय | 04 | 3 | 12 |
| 20–23 | दीर्घ उत्तरीय | 04 | 4 | 16 |
कुल वस्तुनिष्ठ प्रश्न: 32 | 2 अंक: 10 प्रश्न | 3 अंक: 4 प्रश्न | 4 अंक: 4 प्रश्न
भाग-1 : समकालीन विश्व राजनीति
अध्याय 1 — दो ध्रुवीयता का अंत (07 अंक)
1. दो ध्रुवीय विश्व क्या था?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व राजनीति मुख्यतः दो महाशक्तियों—संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ—के आसपास विभाजित हो गई। इसे दो ध्रुवीय व्यवस्था कहा गया।
2. शीत युद्ध
अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक, राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को शीत युद्ध कहा गया। दोनों महाशक्तियाँ सीधे व्यापक युद्ध से बचते हुए प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने का प्रयास करती थीं।
3. सोवियत संघ की विशेषताएँ
- समाजवादी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था
- राज्य के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था
- एक-दलीय राजनीतिक व्यवस्था
- विशाल सैन्य शक्ति
- पूर्वी यूरोप में प्रभाव
4. गोर्बाचेव
मिखाइल गोर्बाचेव 1985 में सोवियत संघ के नेता बने। उन्होंने पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त जैसी नीतियाँ अपनाईं। इनका उद्देश्य सोवियत व्यवस्था में सुधार लाना था।
5. सोवियत संघ का विघटन
1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ। इससे दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई और संयुक्त राज्य अमेरिका प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा।
6. दो ध्रुवीयता के अंत के परिणाम
- शीत युद्ध समाप्त हुआ।
- सोवियत संघ विघटित हुआ।
- अनेक नए स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए।
- अमेरिका का वैश्विक प्रभाव बढ़ा।
- विश्व राजनीति में नई शक्ति-समीकरण की शुरुआत हुई।
7. शॉक थेरेपी
सोवियत संघ के विघटन के बाद कई समाजवादी देशों ने तेज़ी से बाजार अर्थव्यवस्था अपनाने का प्रयास किया। इस आर्थिक संक्रमण को सामान्यतः शॉक थेरेपी कहा जाता है।
2 अंक प्रश्न — उत्तर सहित
प्रश्न 1. दो ध्रुवीयता से क्या आशय है?
दो ध्रुवीयता से आशय ऐसी विश्व व्यवस्था से है जिसमें दो प्रमुख महाशक्तियाँ वैश्विक राजनीति को प्रभावित करती थीं। शीत युद्ध के समय अमेरिका और सोवियत संघ इसके दो प्रमुख ध्रुव थे।
प्रश्न 2. पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त क्या थे?
पेरेस्त्रोइका आर्थिक और राजनीतिक पुनर्गठन की नीति थी, जबकि ग्लासनोस्त अधिक खुलापन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी नीति थी। दोनों नीतियाँ मिखाइल गोर्बाचेव ने सोवियत संघ में अपनाईं।
प्रश्न 3. सोवियत संघ के विघटन का एक प्रमुख परिणाम बताइए।
सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध और दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हुई तथा संयुक्त राज्य अमेरिका का वैश्विक प्रभाव और बढ़ गया।
3 अंक प्रश्न — उत्तर सहित
प्रश्न. सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण बताइए।
सोवियत अर्थव्यवस्था में लंबे समय से ठहराव, राजनीतिक केंद्रीकरण, आर्थिक अक्षमता, विभिन्न गणराज्यों में राष्ट्रवादी भावनाओं का बढ़ना और सुधारों से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता प्रमुख कारण थे। गोर्बाचेव की सुधार नीतियों ने व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप केंद्रीय नियंत्रण कमजोर हुआ और अंततः 1991 में संघ का विघटन हो गया।
4 अंक प्रश्न — उत्तर सहित
प्रश्न. सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व राजनीति में हुए प्रमुख परिवर्तनों को समझाइए।
सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध की समाप्ति हुई और दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था खत्म हो गई। कई नए स्वतंत्र गणराज्य अस्तित्व में आए। संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा। पूर्वी यूरोप में राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन हुए तथा कई देशों ने बाजार आधारित व्यवस्था अपनाई। वैश्विक राजनीति में एकध्रुवीयता के साथ-साथ बाद में नई क्षेत्रीय एवं आर्थिक शक्तियों के उभरने की प्रक्रिया भी शुरू हुई।
महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ तथ्य
- सोवियत संघ का विघटन — 1991
- गोर्बाचेव की प्रमुख सुधार नीतियाँ — पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त
- शीत युद्ध के दो प्रमुख ध्रुव — अमेरिका और सोवियत संघ
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अध्याय 2 — सत्ता के समकालीन केन्द्र (06 अंक)
1. समकालीन शक्ति केन्द्र
शीत युद्ध के बाद विश्व में केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी, राजनीतिक और क्षेत्रीय शक्ति भी महत्वपूर्ण हो गई। यूरोपीय संघ, चीन और जापान जैसे शक्ति केन्द्र उभरे।
2. यूरोपीय संघ
यूरोपीय संघ यूरोपीय देशों का एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। इसका उद्देश्य आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ाना है। इसकी साझा संस्थाएँ और कई मामलों में साझा नीतियाँ हैं।
3. चीन का उदय
चीन ने आर्थिक सुधारों और खुलेपन की नीतियों के माध्यम से तेजी से आर्थिक विकास किया। उसने विश्व अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत की।
4. जापान
जापान एक विकसित औद्योगिक और तकनीकी शक्ति है। आर्थिक क्षमता, तकनीक और निवेश के कारण उसका वैश्विक महत्व है।
5. ASEAN
ASEAN दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन है जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. यूरोपीय संघ क्या है?
यूरोपीय संघ यूरोपीय देशों का क्षेत्रीय संगठन है जो आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देता है। यह विश्व राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र है।
प्रश्न 2. चीन के उदय का एक कारण बताइए।
चीन के आर्थिक सुधारों और खुलेपन की नीतियों से उत्पादन, व्यापार और विदेशी निवेश में वृद्धि हुई, जिससे चीन एक प्रमुख वैश्विक आर्थिक शक्ति बना।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. यूरोपीय संघ की शक्ति के प्रमुख आधार बताइए।
यूरोपीय संघ की शक्ति का आधार उसका विशाल साझा बाजार, आर्थिक समृद्धि, तकनीकी क्षमता, विकसित संस्थाएँ और सदस्य देशों की सामूहिक राजनीतिक भूमिका है। कई क्षेत्रों में सामूहिक निर्णय लेने से उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रभाव क्षमता बढ़ती है।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. चीन को समकालीन शक्ति केन्द्र के रूप में समझाइए।
चीन ने आर्थिक सुधारों के बाद तेज औद्योगिकीकरण और निर्यात-आधारित विकास हासिल किया। विशाल जनसंख्या और बाजार, विनिर्माण क्षमता, तकनीकी विकास तथा विदेशी निवेश ने उसकी आर्थिक शक्ति बढ़ाई। इसके साथ चीन ने कूटनीतिक और सैन्य क्षमता भी विकसित की। आज वह एशिया तथा विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण शक्ति है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका लगातार बढ़ी है।
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अध्याय 3 — समकालीन दक्षिण एशिया (05 अंक)
1. दक्षिण एशिया
दक्षिण एशिया में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव जैसे देश शामिल माने जाते हैं। क्षेत्र में विविध राजनीतिक व्यवस्थाएँ और लंबे समय से चले आ रहे विवाद हैं।
2. भारत-पाकिस्तान संबंध
कश्मीर, सीमा विवाद, आतंकवाद और जल जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया है। समय-समय पर बातचीत और शांति प्रयास भी हुए हैं।
3. लोकतंत्र और सैन्य शासन
भारत और कुछ अन्य दक्षिण एशियाई देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ विकसित हुईं, जबकि पाकिस्तान में विभिन्न समयों पर सैन्य शासन रहा।
4. श्रीलंका
श्रीलंका में सिंहली और तमिल समुदायों के बीच संघर्ष ने लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता पैदा की। LTTE से संबंधित संघर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा।
5. क्षेत्रीय सहयोग — SAARC
SAARC दक्षिण एशियाई देशों के क्षेत्रीय सहयोग का संगठन है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग और विकास को बढ़ावा देना है।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. SAARC क्या है?
SAARC दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन है। इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना है।
प्रश्न 2. भारत-पाकिस्तान संबंधों में प्रमुख विवाद कौन-सा है?
कश्मीर विवाद भारत-पाकिस्तान संबंधों का प्रमुख विवाद रहा है। इसके अतिरिक्त आतंकवाद, सीमा और जल संबंधी मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. दक्षिण एशिया में लोकतंत्र के विकास की स्थिति समझाइए।
दक्षिण एशिया में लोकतंत्र का अनुभव एक जैसा नहीं रहा। भारत में लोकतंत्र निरंतर बना रहा, जबकि पाकिस्तान में सैन्य शासन के दौर आए। नेपाल में राजशाही से लोकतांत्रिक गणराज्य की ओर परिवर्तन हुआ और अन्य देशों में भी लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास अलग-अलग गति से हुआ।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता क्यों है?
दक्षिण एशियाई देशों में भौगोलिक निकटता, समान ऐतिहासिक अनुभव और आर्थिक तथा सामाजिक समस्याएँ हैं। आतंकवाद, गरीबी, जल, पर्यावरण, व्यापार और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग आवश्यक है। SAARC जैसे मंच क्षेत्रीय संवाद और सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं। हालांकि राजनीतिक विवाद और आपसी अविश्वास कई बार क्षेत्रीय सहयोग को सीमित करते हैं।
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अध्याय 4 — अंतर्राष्ट्रीय संगठन (07 अंक)
1. अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का महत्व
अंतर्राष्ट्रीय संगठन देशों को संवाद, सहयोग और सामूहिक समस्या-समाधान का मंच प्रदान करते हैं।
2. संयुक्त राष्ट्र
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में हुई। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, देशों के बीच सहयोग बढ़ाना और मानवाधिकारों को बढ़ावा देना है।
3. संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख संस्थाएँ
- महासभा
- सुरक्षा परिषद
- आर्थिक और सामाजिक परिषद
- अंतरराष्ट्रीय न्यायालय
- सचिवालय
- न्यासी परिषद
4. सुरक्षा परिषद
सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन। स्थायी सदस्यों के पास वीटो अधिकार है।
5. संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी संरचना आज के वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह नहीं दर्शाती। भारत सहित कई देश सुरक्षा परिषद में व्यापक प्रतिनिधित्व और सुधार की माँग करते रहे हैं।
6. अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ
विश्व बैंक, IMF, WTO आदि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई?
उत्तर: 1945 में।
प्रश्न 2. सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य कौन हैं?
उत्तर: अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन।
प्रश्न 3. वीटो क्या है?
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य को किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोकने की विशेष शक्ति को वीटो अधिकार कहा जाता है।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता क्यों है?
संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों पर आधारित है। आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भूमिका बढ़ गई है। इसलिए अधिक प्रतिनिधित्व, लोकतांत्रिकता और निर्णय प्रक्रिया में सुधार आवश्यक माना जाता है। भारत जैसे देश सुरक्षा परिषद के विस्तार की माँग करते हैं।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र के महत्व का वर्णन कीजिए।
संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने का प्रमुख वैश्विक मंच है। यह देशों को संवाद और विवाद समाधान का अवसर देता है। शांति स्थापना अभियानों, मानवाधिकारों, स्वास्थ्य, विकास, शरणार्थी सहायता तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। विभिन्न विशेषीकृत संस्थाओं के माध्यम से यह सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर भी काम करता है। हालांकि उसकी प्रभावशीलता कई बार शक्तिशाली देशों के हितों और सुरक्षा परिषद की संरचना से प्रभावित होती है।
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अध्याय 5 — समकालीन विश्व में सुरक्षा (05 अंक)
1. सुरक्षा का अर्थ
किसी देश, समाज या व्यक्ति को गंभीर खतरों से सुरक्षित रखने की व्यवस्था को सुरक्षा कहा जाता है।
परंपरागत रूप से सुरक्षा को मुख्यतः सैन्य शक्ति और बाहरी आक्रमण से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन आधुनिक समय में इसकी अवधारणा अधिक व्यापक हो गई है।
2. पारंपरिक सुरक्षा
पारंपरिक सुरक्षा मुख्यतः राज्य की सुरक्षा पर केंद्रित होती है। इसमें बाहरी सैन्य आक्रमण, सीमा सुरक्षा, युद्ध, शक्ति संतुलन और राष्ट्रीय संप्रभुता जैसे विषय शामिल हैं।
- बाहरी सैन्य खतरे से सुरक्षा
- सीमा और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा
- राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा
- सैन्य शक्ति का महत्व
- युद्ध एवं शक्ति संतुलन से संबंधित प्रश्न
3. गैर-पारंपरिक सुरक्षा
गैर-पारंपरिक सुरक्षा में ऐसे खतरे शामिल हैं जो केवल सैन्य आक्रमण तक सीमित नहीं हैं। इनमें आतंकवाद, गरीबी, महामारी, पर्यावरणीय संकट, खाद्य संकट और मानव सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं।
4. मानव सुरक्षा
मानव सुरक्षा का केंद्र राज्य के बजाय व्यक्ति और उसका सुरक्षित एवं सम्मानजनक जीवन है। इसमें व्यक्ति को हिंसा, बीमारी, भूख, गरीबी तथा अन्य गंभीर खतरों से सुरक्षा देने पर बल दिया जाता है।
5. सहयोगात्मक सुरक्षा
आज कई सुरक्षा चुनौतियों का समाधान किसी एक देश द्वारा संभव नहीं है। आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, महामारी और परमाणु हथियार जैसे प्रश्नों के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।
2 अंक प्रश्न — उत्तर सहित
प्रश्न 1. पारंपरिक सुरक्षा से क्या आशय है?
पारंपरिक सुरक्षा मुख्यतः राज्य को बाहरी सैन्य आक्रमण, युद्ध, सीमा खतरे तथा राष्ट्रीय संप्रभुता से संबंधित खतरों से सुरक्षित रखने पर केंद्रित होती है।
प्रश्न 2. गैर-पारंपरिक सुरक्षा के दो उदाहरण दीजिए।
आतंकवाद और महामारी गैर-पारंपरिक सुरक्षा के प्रमुख उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त गरीबी और पर्यावरणीय संकट भी इसमें शामिल हैं।
3 अंक प्रश्न — उत्तर सहित
प्रश्न. मानव सुरक्षा और राज्य सुरक्षा में अंतर बताइए।
राज्य सुरक्षा का मुख्य केंद्र राष्ट्र-राज्य, उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता होती है। मानव सुरक्षा का केंद्र व्यक्ति होता है। राज्य सुरक्षा मुख्यतः बाहरी सैन्य खतरों पर ध्यान देती है, जबकि मानव सुरक्षा में गरीबी, भूख, बीमारी, हिंसा और पर्यावरणीय संकट जैसे व्यापक खतरे शामिल होते हैं।
4 अंक प्रश्न — उत्तर सहित
प्रश्न. समकालीन विश्व में सुरक्षा की अवधारणा व्यापक क्यों हुई है?
आज सुरक्षा के सामने केवल सैन्य आक्रमण ही चुनौती नहीं है। आतंकवाद, महामारी, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं जल संकट, गरीबी और पर्यावरणीय संकट किसी भी देश और समाज को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। इन समस्याओं का प्रभाव सीमा पार भी हो सकता है। इसलिए आधुनिक सुरक्षा दृष्टिकोण में सैन्य सुरक्षा के साथ मानव सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, पर्यावरणीय सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को भी महत्व दिया जाता है।
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अध्याय 6 — पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन (06 अंक)
1. पर्यावरण का राजनीतिक महत्व
पर्यावरणीय समस्याएँ अब केवल स्थानीय या राष्ट्रीय विषय नहीं रह गई हैं। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जैव विविधता का क्षय, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसे मुद्दे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन चुके हैं।
2. वैश्विक संपदा
ऐसे प्राकृतिक संसाधन या क्षेत्र जिन पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता और जिनका प्रभाव पूरी मानवता पर पड़ता है, वैश्विक संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। उदाहरण के रूप में वायुमंडल, समुद्र और अंटार्कटिका से जुड़े संसाधनों को देखा जा सकता है।
3. पर्यावरणीय समस्याएँ
- जलवायु परिवर्तन
- ग्लोबल वार्मिंग
- वनों की कटाई
- जैव विविधता का ह्रास
- वायु एवं जल प्रदूषण
- प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन
4. पर्यावरणीय न्याय
पर्यावरण संरक्षण की लागत और उसके लाभों का न्यायपूर्ण वितरण पर्यावरणीय न्याय से संबंधित है। विकासशील देशों का तर्क है कि विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया है और प्रदूषण में भी उनका योगदान अधिक रहा है।
5. सतत विकास
ऐसा विकास जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाए, सतत विकास कहलाता है।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. पर्यावरणीय न्याय क्या है?
पर्यावरण संरक्षण से होने वाले लाभों और उसकी लागत का देशों तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच न्यायपूर्ण वितरण पर्यावरणीय न्याय कहलाता है।
प्रश्न 2. सतत विकास से क्या आशय है?
ऐसा विकास जो वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करे और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता को प्रभावित न करे, सतत विकास कहलाता है।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग क्यों आवश्यक है?
जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण और वायुमंडलीय समस्याएँ किसी एक देश तक सीमित नहीं रहतीं। एक देश के प्रदूषण का प्रभाव दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है। इसलिए उत्सर्जन कम करने, तकनीक साझा करने, वित्तीय सहायता देने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए देशों के बीच सहयोग आवश्यक है।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. पर्यावरण के प्रश्न पर विकसित और विकासशील देशों के दृष्टिकोण में अंतर समझाइए।
विकसित देशों द्वारा ऐतिहासिक रूप से अधिक औद्योगिकीकरण और संसाधनों के उपयोग के कारण विकासशील देश तर्क देते हैं कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी में ऐतिहासिक योगदान को ध्यान में रखा जाना चाहिए। विकासशील देशों की प्राथमिकता गरीबी हटाना और आर्थिक विकास करना भी है। इसलिए वे तकनीक और वित्तीय सहायता की मांग करते हैं। दूसरी ओर विकसित देश सभी देशों से पर्यावरण संरक्षण और उत्सर्जन नियंत्रण में भागीदारी की अपेक्षा करते हैं। इसीलिए वैश्विक पर्यावरणीय नीति में समानता तथा साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारी महत्वपूर्ण विषय है।
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अध्याय 7 — वैश्वीकरण (04 अंक)
1. वैश्वीकरण का अर्थ
विश्व की अर्थव्यवस्थाओं, समाजों और संस्कृतियों का व्यापार, पूँजी, तकनीक, संचार और विचारों के माध्यम से एक-दूसरे से अधिक जुड़ना वैश्वीकरण कहलाता है।
2. वैश्वीकरण के प्रमुख कारण
- सूचना और संचार तकनीक का विकास
- परिवहन के साधनों में सुधार
- व्यापार एवं निवेश का विस्तार
- आर्थिक उदारीकरण
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार
3. वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभाव
वैश्वीकरण से विदेशी निवेश, तकनीक, बाजार और व्यापार के अवसर बढ़े। अनेक देशों में उत्पादन और सेवाओं का अंतर्राष्ट्रीयकरण हुआ।
4. वैश्वीकरण के राजनीतिक प्रभाव
वैश्वीकरण ने राष्ट्र-राज्य की भूमिका को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसकी भूमिका के स्वरूप में परिवर्तन किया। राज्य को वैश्विक आर्थिक नियमों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ समन्वय करना पड़ता है।
5. वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव
फिल्म, इंटरनेट, संगीत, भोजन और जीवनशैली के माध्यम से विभिन्न संस्कृतियों का आदान-प्रदान बढ़ा है। इसके साथ स्थानीय संस्कृतियों के सामने चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. वैश्वीकरण क्या है?
विश्व के विभिन्न देशों और समाजों का आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी और सांस्कृतिक रूप से अधिक परस्पर जुड़ना वैश्वीकरण कहलाता है।
प्रश्न 2. वैश्वीकरण का एक प्रमुख कारण बताइए।
सूचना एवं संचार तकनीक का तीव्र विकास वैश्वीकरण का प्रमुख कारण है।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. वैश्वीकरण के तीन प्रमुख प्रभाव बताइए।
वैश्वीकरण से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और निवेश बढ़े, नई तकनीकों का प्रसार हुआ तथा देशों के बीच आर्थिक एवं सांस्कृतिक संपर्क बढ़ा। इसके साथ स्थानीय उद्योगों और रोजगार के सामने प्रतिस्पर्धा की चुनौतियाँ भी आईं।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. वैश्वीकरण के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
सकारात्मक प्रभावों में विदेशी निवेश, नई तकनीक, नए बाजार, रोजगार के अवसर और अंतर्राष्ट्रीय संपर्कों का विस्तार शामिल हैं। नकारात्मक प्रभावों में छोटे उत्पादकों पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दबाव, आर्थिक असमानता, कुछ क्षेत्रों में रोजगार की असुरक्षा तथा स्थानीय संस्कृतियों पर बाहरी प्रभाव शामिल हैं। इसलिए वैश्वीकरण का प्रभाव समाज और आर्थिक क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
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भाग-2 : स्वतंत्र भारत में राजनीति
अध्याय 1 — राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ (06 अंक)
1. स्वतंत्रता के समय भारत के सामने चुनौतियाँ
- राष्ट्रीय एकता और अखंडता बनाए रखना
- विभाजन की समस्या और शरणार्थियों का पुनर्वास
- देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय
- लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना
- विविध भाषाई, धार्मिक एवं सांस्कृतिक समूहों को साथ रखना
2. रियासतों का एकीकरण
स्वतंत्रता के समय भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक देशी रियासतें थीं। भारत सरकार ने समझौते, बातचीत और राजनीतिक प्रयासों के माध्यम से अधिकांश रियासतों को भारतीय संघ में शामिल किया।
3. हैदराबाद
हैदराबाद के भारतीय संघ में विलय का प्रश्न जटिल था। अंततः 1948 में सैन्य कार्रवाई के बाद हैदराबाद भारत का हिस्सा बना।
4. जम्मू-कश्मीर
जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय और उसके बाद उत्पन्न विवाद ने स्वतंत्र भारत की राजनीति और सुरक्षा को प्रभावित किया।
5. भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन
भारत में विभिन्न भाषाई समूहों ने अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग की। भाषाई राज्यों के गठन ने विविधता को संघीय ढाँचे में समायोजित करने में मदद की।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. राष्ट्र निर्माण की दो प्रमुख चुनौतियाँ लिखिए।
राष्ट्रीय एकता स्थापित करना और विभाजन से उत्पन्न शरणार्थी एवं साम्प्रदायिक संकट का समाधान करना प्रमुख चुनौतियाँ थीं।
प्रश्न 2. देशी रियासतों के एकीकरण का महत्व क्या था?
रियासतों के एकीकरण से भारत की राजनीतिक और भौगोलिक एकता मजबूत हुई तथा एक संगठित भारतीय संघ का निर्माण संभव हुआ।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. भाषाई राज्यों के निर्माण का महत्व बताइए।
भाषाई राज्यों के निर्माण से विभिन्न भाषाई समुदायों को प्रशासनिक और सांस्कृतिक पहचान मिली। इससे क्षेत्रीय असंतोष को लोकतांत्रिक ढंग से समायोजित करने में सहायता मिली और भारतीय संघवाद मजबूत हुआ।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. स्वतंत्र भारत में राष्ट्र निर्माण की प्रमुख चुनौतियों को समझाइए।
स्वतंत्रता के समय भारत को विभाजन की हिंसा और शरणार्थियों के पुनर्वास की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा। दूसरी चुनौती देशी रियासतों का भारतीय संघ में एकीकरण था। तीसरी चुनौती भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्रीय विविधताओं को लोकतांत्रिक व्यवस्था में समायोजित करना थी। इसके साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना भी आवश्यक था। संविधान, संघवाद और लोकतांत्रिक व्यवस्था ने इन चुनौतियों से निपटने का आधार प्रदान किया।
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अध्याय 2 — एक दल के प्रभुत्व का दौर (03 अंक)
1. कांग्रेस का प्रभुत्व
स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक दशकों में भारतीय राजनीति में कांग्रेस का व्यापक प्रभुत्व रहा। लोकसभा और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस को लगातार चुनावी सफलता मिली।
2. कांग्रेस के प्रभुत्व के कारण
- स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत
- व्यापक सामाजिक आधार
- देशभर में संगठनात्मक नेटवर्क
- प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं की लोकप्रियता
- विपक्षी दलों का अपेक्षाकृत कमजोर होना
3. विपक्ष का महत्व
कांग्रेस के प्रभुत्व के बावजूद विपक्षी दल लोकतांत्रिक राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने विभिन्न सामाजिक और वैचारिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न. कांग्रेस के प्रभुत्व के दो कारण बताइए।
स्वतंत्रता आंदोलन से मिली लोकप्रियता और पूरे देश में मजबूत संगठन कांग्रेस के प्रभुत्व के प्रमुख कारण थे।
प्रश्न. कांग्रेस प्रणाली का अर्थ क्या है?
ऐसी राजनीतिक व्यवस्था जिसमें कांग्रेस लंबे समय तक प्रमुख चुनावी एवं राजनीतिक शक्ति बनी रही और विभिन्न सामाजिक समूहों को अपने भीतर समाहित करती रही, कांग्रेस प्रणाली कहलाती है।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. कांग्रेस का प्रभुत्व लोकतंत्र-विरोधी क्यों नहीं था?
भारत में नियमित और प्रतिस्पर्धी चुनाव होते थे। विपक्षी दल मौजूद थे और मतदाताओं को विकल्प उपलब्ध थे। इसलिए कांग्रेस का प्रभुत्व चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक वैधता के भीतर स्थापित हुआ था।
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अध्याय 3 — नियोजित विकास की राजनीति (03 अंक)
1. नियोजन का अर्थ
आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों का प्राथमिकताओं के अनुसार योजनाबद्ध उपयोग करना नियोजन कहलाता है।
2. योजना आयोग
भारत ने स्वतंत्रता के बाद आर्थिक विकास के लिए योजनाबद्ध विकास का मार्ग अपनाया। योजना आयोग ने विकास की प्राथमिकताओं और योजनाओं को तैयार करने में भूमिका निभाई।
3. मिश्रित अर्थव्यवस्था
भारत ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों को महत्व देने वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया।
4. नियोजन के उद्देश्य
- आर्थिक विकास
- गरीबी कम करना
- रोजगार बढ़ाना
- औद्योगिकीकरण
- सामाजिक एवं आर्थिक असमानता कम करना
2 अंक प्रश्न
प्रश्न. मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है?
जिस अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक तथा निजी दोनों क्षेत्रों की भूमिका होती है, उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहा जाता है।
प्रश्न. नियोजन क्यों अपनाया गया?
गरीबी, बेरोजगारी, कम औद्योगिक विकास और सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए आर्थिक विकास को दिशा देने के लिए भारत ने नियोजन अपनाया।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. भारत में नियोजित विकास के तीन प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
आर्थिक विकास की गति बढ़ाना, गरीबी एवं बेरोजगारी कम करना तथा औद्योगिकीकरण और संसाधनों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना इसके प्रमुख उद्देश्य थे।
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अध्याय 4 — भारत के विदेश संबंध (07 अंक)
1. भारत की विदेश नीति
भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, विश्व शांति, उपनिवेशवाद-विरोध और स्वतंत्र निर्णय क्षमता जैसे सिद्धांतों से प्रभावित रही है।
2. गुटनिरपेक्षता
शीत युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिका या सोवियत संघ के किसी सैन्य गुट में शामिल होने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई। इसे गुटनिरपेक्षता कहा गया।
3. पंचशील
- एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान
- एक-दूसरे पर आक्रमण न करना
- आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना
- समानता और पारस्परिक लाभ
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
4. भारत-चीन संबंध
प्रारंभ में भारत और चीन के संबंध मैत्रीपूर्ण थे और पंचशील समझौते ने इसमें योगदान दिया। बाद में सीमा विवाद और अन्य मतभेदों के कारण तनाव बढ़ा तथा 1962 में दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ।
5. भारत-पाकिस्तान संबंध
भारत-पाकिस्तान संबंधों में कश्मीर, सीमा, आतंकवाद और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे रहे हैं। दोनों देशों के बीच युद्ध तथा शांति वार्ता दोनों का इतिहास रहा है।
6. भारत और परमाणु नीति
भारत ने परमाणु क्षमता को राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से जोड़ा। भारत ने परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में भी समर्थन व्यक्त किया है।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. गुटनिरपेक्षता से क्या आशय है?
किसी सैन्य गुट में शामिल हुए बिना स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना और प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर अपने राष्ट्रीय हित के अनुसार निर्णय लेना गुटनिरपेक्षता कहलाता है।
प्रश्न 2. पंचशील का कोई दो सिद्धांत लिखिए।
एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान तथा एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना पंचशील के प्रमुख सिद्धांत हैं।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा, विश्व शांति को बढ़ावा देना, स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखना तथा आर्थिक विकास के लिए अनुकूल अंतर्राष्ट्रीय वातावरण बनाना भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य हैं।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति का महत्व समझाइए।
गुटनिरपेक्षता ने भारत को शीत युद्ध के दोनों शक्ति गुटों से स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता दी। भारत ने उपनिवेशवाद, नस्लवाद और सैन्य गुटबंदी का विरोध किया। भारत ने विकासशील देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया और विश्व शांति तथा निरस्त्रीकरण का समर्थन किया। इस नीति के माध्यम से भारत ने राष्ट्रीय हितों के साथ अंतर्राष्ट्रीय शांति और सहयोग को भी महत्व दिया।
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अध्याय 5 — कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना (03 अंक)
1. 1967 का चुनाव
1967 के आम चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व पहली बार गंभीर रूप से चुनौतीपूर्ण हुआ। कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी दलों ने सरकारें बनाईं।
2. गैर-कांग्रेसवाद
विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा कांग्रेस के विरुद्ध एकजुट होकर चुनावी और राजनीतिक रणनीति अपनाने को गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति से जोड़ा गया।
3. कांग्रेस विभाजन — 1969
1969 में कांग्रेस में विभाजन हुआ। संगठन और नेतृत्व के बीच संघर्ष ने पार्टी के भीतर बड़ी राजनीतिक टूट पैदा की।
4. इंदिरा गांधी का नेतृत्व
इंदिरा गांधी ने लोकप्रिय नीतियों और 'गरीबी हटाओ' जैसे नारों के माध्यम से व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया। 1971 के चुनावों में कांग्रेस को महत्वपूर्ण सफलता मिली।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न. 1967 के चुनावों का महत्व बताइए।
1967 में कांग्रेस को कई राज्यों में गंभीर चुनौती मिली। इससे लंबे समय से चले आ रहे कांग्रेस प्रभुत्व की कमजोरी सामने आई और गैर-कांग्रेसी राजनीति मजबूत हुई।
प्रश्न. 1969 में कांग्रेस में क्या हुआ?
1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ। पार्टी के संगठनात्मक नेतृत्व और इंदिरा गांधी के नेतृत्व के बीच संघर्ष इसका प्रमुख कारण बना।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. कांग्रेस प्रणाली को मिली प्रमुख चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
1967 के चुनावों में विपक्षी दलों का मजबूत होना, राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का बनना और 1969 में कांग्रेस का विभाजन प्रमुख चुनौतियाँ थीं। इन घटनाओं ने कांग्रेस के भीतर तथा बाहर दोनों स्तरों पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाई।
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अध्याय 6 — लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट (07 अंक)
1. संकट की पृष्ठभूमि
1970 के दशक में आर्थिक संकट, बेरोजगारी, महँगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों ने राजनीतिक असंतोष को बढ़ाया। विभिन्न राज्यों में सरकार के विरुद्ध आंदोलन हुए।
2. गुजरात और बिहार आंदोलन
छात्र और जनता ने भ्रष्टाचार, महँगाई एवं शासन की समस्याओं के विरुद्ध आंदोलन किए। बिहार आंदोलन में जयप्रकाश नारायण ने महत्वपूर्ण नेतृत्व दिया।
3. सम्पूर्ण क्रांति
जयप्रकाश नारायण ने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन के लिए 'सम्पूर्ण क्रांति' का आह्वान किया।
4. आपातकाल
25 जून 1975 को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया। इस अवधि में राजनीतिक गतिविधियों, प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर अनेक प्रतिबंध लगाए गए तथा विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं।
5. 1977 का चुनाव
1977 के चुनाव में जनता पार्टी को सफलता मिली और केंद्र में पहली बार कांग्रेस के बाहर की सरकार बनी। इसने भारतीय लोकतंत्र में मतदाता की शक्ति को स्पष्ट किया।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. राष्ट्रीय आपातकाल कब घोषित किया गया?
25 जून 1975 को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया।
प्रश्न 2. सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किसने किया?
जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़े प्रभाव लिखिए।
नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगा, प्रेस पर नियंत्रण बढ़ा और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं। राजनीतिक विरोध की गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगे। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का महत्व स्पष्ट हुआ।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. 1975-77 के आपातकाल से भारतीय लोकतंत्र को क्या सीख मिली?
आपातकाल ने दिखाया कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए केवल चुनाव पर्याप्त नहीं हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस, नागरिक अधिकार, विपक्ष की भूमिका और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता आवश्यक हैं। सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण से लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। 1977 के चुनाव ने यह सिद्ध किया कि जनता लोकतांत्रिक माध्यम से सरकार को बदल सकती है।
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अध्याय 7 — क्षेत्रीय आकांक्षाएँ (07 अंक)
1. क्षेत्रीय आकांक्षा
किसी क्षेत्र के लोगों की भाषा, संस्कृति, पहचान, स्वायत्तता, आर्थिक विकास या राजनीतिक अधिकारों से संबंधित विशेष मांगों को क्षेत्रीय आकांक्षा कहा जाता है।
2. पंजाब
पंजाब में भाषाई, धार्मिक और राजनीतिक मांगों ने समय-समय पर तनाव उत्पन्न किया। आनंदपुर साहिब प्रस्ताव तथा बाद की हिंसक परिस्थितियाँ इस अध्याय के महत्वपूर्ण विषय हैं।
3. जम्मू-कश्मीर
जम्मू-कश्मीर की राजनीति में स्वायत्तता, पहचान, चुनाव, आतंकवाद और अलगाववाद जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहे हैं।
4. उत्तर-पूर्व
उत्तर-पूर्व के अनेक क्षेत्रों में जातीय पहचान, स्वायत्तता, आर्थिक विकास और अलग राज्य की मांगें उठीं। विभिन्न समझौतों और संवैधानिक व्यवस्थाओं द्वारा समाधान के प्रयास किए गए।
5. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने के बजाय संवाद, संघवाद, स्वायत्तता और विकास के माध्यम से समायोजित करना राष्ट्रीय एकता को मजबूत कर सकता है।
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. क्षेत्रीय आकांक्षा से क्या आशय है?
किसी क्षेत्र के लोगों द्वारा अपनी भाषा, संस्कृति, पहचान, स्वायत्तता अथवा विकास संबंधी विशेष मांगों को क्षेत्रीय आकांक्षा कहा जाता है।
प्रश्न 2. क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान कैसे किया जा सकता है?
संवाद, संघीय व्यवस्था, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, स्वायत्तता तथा संवैधानिक समझौतों के माध्यम से क्षेत्रीय आकांक्षाओं का लोकतांत्रिक समाधान किया जा सकता है।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. उत्तर-पूर्व भारत की राजनीति की तीन प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-पूर्व में जातीय और सांस्कृतिक विविधता, स्वायत्तता की मांग तथा अलग पहचान से जुड़ी राजनीतिक आकांक्षाएँ प्रमुख हैं। कुछ क्षेत्रों में सशस्त्र आंदोलनों और बाद में शांति समझौतों का अनुभव भी रहा है।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ भारतीय राष्ट्र की एकता के लिए चुनौती होने के साथ अवसर भी हैं। समझाइए।
क्षेत्रीय आकांक्षाओं की उपेक्षा होने पर अलगाववाद, हिंसा और असंतोष बढ़ सकता है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन्हें क्षेत्रीय दलों, संघवाद, स्वायत्तता, संवाद और विकास के माध्यम से समायोजित किया जा सकता है। क्षेत्रीय पहचान को सम्मान मिलने से नागरिकों का भारतीय लोकतंत्र पर विश्वास बढ़ता है। इसलिए लोकतांत्रिक समायोजन क्षेत्रीय विविधता को राष्ट्रीय एकता की शक्ति में बदल सकता है।
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अध्याय 8 — भारतीय राजनीति: नए बदलाव (04 अंक)
1. 1989 के बाद की राजनीति
1989 के बाद भारतीय राजनीति में कांग्रेस के एकदलीय प्रभुत्व की जगह बहुदलीय तथा गठबंधन राजनीति का दौर मजबूत हुआ।
2. गठबंधन राजनीति
जब अनेक राजनीतिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं तो इसे गठबंधन सरकार कहा जाता है। गठबंधन राजनीति में सहमति और समझौते का महत्व बढ़ जाता है।
3. मंडल आयोग
मंडल आयोग की सिफारिशों ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण और सामाजिक न्याय की राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बनाया।
4. भाजपा का उदय
भारतीय जनता पार्टी ने 1980 के दशक के बाद राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत की और आगे चलकर प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में उभरी।
5. क्षेत्रीय दलों की भूमिका
क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गठबंधन सरकारों के निर्माण में अनेक क्षेत्रीय दल निर्णायक रहे।
6. नई राजनीतिक सहमति
- आर्थिक सुधार
- सामाजिक न्याय
- गठबंधन राजनीति
- क्षेत्रीय दलों की भूमिका
- पिछड़े वर्गों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व
2 अंक प्रश्न
प्रश्न 1. गठबंधन राजनीति क्या है?
जब दो या अधिक राजनीतिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं और सरकार का संचालन साझा समर्थन एवं सहमति के आधार पर करते हैं, तो इसे गठबंधन राजनीति कहते हैं।
प्रश्न 2. मंडल आयोग किससे संबंधित था?
मंडल आयोग सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान तथा उनके लिए आरक्षण की सिफारिशों से संबंधित था।
3 अंक प्रश्न
प्रश्न. 1989 के बाद भारतीय राजनीति में आए प्रमुख बदलाव लिखिए।
एकदलीय प्रभुत्व में कमी, गठबंधन राजनीति का विस्तार, क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव तथा सामाजिक न्याय और आरक्षण की राजनीति का महत्व बढ़ना प्रमुख बदलाव थे।
4 अंक प्रश्न
प्रश्न. 1989 के बाद गठबंधन राजनीति के प्रमुख प्रभावों को समझाइए।
गठबंधन राजनीति ने क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया। केंद्र सरकारों को विभिन्न दलों के साथ समझौता और सहमति बनानी पड़ी। इससे संघीय भावना मजबूत हुई और विभिन्न क्षेत्रों की राजनीतिक आकांक्षाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व मिला। हालांकि गठबंधन सरकारों में निर्णय लेने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है, फिर भी इस दौर ने भारतीय लोकतंत्र में बहुदलीय प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक सहमति को मजबूत किया।
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कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान — अध्याय 1 से 15 के महत्वपूर्ण प्रश्न एवं मॉडल उत्तर
परीक्षा उपयोग: नीचे सभी 15 अध्यायों से महत्वपूर्ण 2 अंक, 3 अंक एवं 4 अंक के प्रश्न दिए गए हैं। उत्तर परीक्षा में लिखने योग्य भाषा में हैं। प्रत्येक अध्याय के प्रमुख तथ्य, कारण, परिणाम, तुलना तथा विश्लेषणात्मक प्रश्नों को शामिल किया गया है।
अध्याय 1 — दो ध्रुवीयता का अंत
प्रश्न 1. द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था से क्या आशय है?
द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था से आशय ऐसी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था से है जिसमें दो प्रमुख महाशक्तियाँ विश्व राजनीति को प्रभावित करती हैं। शीत युद्ध के समय अमेरिका और सोवियत संघ इसके दो प्रमुख शक्ति केन्द्र थे।
प्रश्न 2. शीत युद्ध क्या था?
अमेरिका और सोवियत संघ के बीच प्रत्यक्ष युद्ध के बिना वैचारिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा को शीत युद्ध कहा गया। दोनों महाशक्तियाँ अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र और सहयोगी बढ़ाने का प्रयास करती थीं।
प्रश्न 3. सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण बताइए।
सोवियत अर्थव्यवस्था में लंबे समय से ठहराव, राजनीतिक केंद्रीकरण, प्रशासनिक अक्षमता, विभिन्न गणराज्यों में राष्ट्रवादी भावनाओं का बढ़ना तथा आर्थिक एवं राजनीतिक सुधारों से उत्पन्न अस्थिरता प्रमुख कारण थे। इन परिस्थितियों के कारण केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई और 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया।
प्रश्न 4. सोवियत संघ के विघटन के परिणाम समझाइए।
सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध समाप्त हुआ और द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई। अनेक नए स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए। अमेरिका का वैश्विक प्रभाव बढ़ा। पूर्व समाजवादी देशों में राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन हुए तथा विश्व राजनीति में नए शक्ति-संतुलन की प्रक्रिया शुरू हुई।
अध्याय 2 — सत्ता के समकालीन केन्द्र
प्रश्न 5. यूरोपीय संघ क्या है?
यूरोपीय संघ यूरोपीय देशों का एक क्षेत्रीय संगठन है जो आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग को बढ़ावा देता है। इसकी सामूहिक आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति के कारण यह विश्व राजनीति का एक महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र है।
प्रश्न 6. चीन के उदय के प्रमुख कारण बताइए।
आर्थिक सुधार, खुलेपन की नीति, विदेशी निवेश, औद्योगिक उत्पादन, निर्यात और विशाल घरेलू बाजार चीन की शक्ति के प्रमुख आधार हैं। इन कारणों से चीन विश्व अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा।
प्रश्न 7. यूरोपीय संघ को एक महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र क्यों माना जाता है?
यूरोपीय संघ के पास विशाल आर्थिक बाजार, विकसित औद्योगिक और तकनीकी क्षमता, साझा संस्थाएँ तथा सामूहिक राजनीतिक प्रभाव है। कई अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर यूरोपीय देश सामूहिक रूप से प्रभाव डाल सकते हैं।
प्रश्न 8. चीन और जापान की शक्ति के प्रमुख आधारों की तुलना कीजिए।
चीन की शक्ति का प्रमुख आधार विशाल जनसंख्या, औद्योगिक उत्पादन, निर्यात, बढ़ती तकनीकी क्षमता और सैन्य शक्ति है। जापान की शक्ति का प्रमुख आधार अत्याधुनिक तकनीक, विकसित उद्योग, आर्थिक क्षमता और उच्च उत्पादकता है। दोनों एशिया के महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र हैं।
अध्याय 3 — समकालीन दक्षिण एशिया
प्रश्न 9. दक्षिण एशिया के प्रमुख देशों के नाम लिखिए।
दक्षिण एशिया के प्रमुख देशों में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव शामिल हैं।
प्रश्न 10. भारत-पाकिस्तान संबंधों में प्रमुख विवाद कौन-कौन से हैं?
कश्मीर विवाद, सीमा संबंधी विवाद, आतंकवाद एवं सुरक्षा के प्रश्न तथा कुछ जल संबंधी मुद्दे भारत-पाकिस्तान संबंधों को प्रभावित करते रहे हैं।
प्रश्न 11. दक्षिण एशिया में लोकतंत्र की स्थिति समझाइए।
दक्षिण एशिया में लोकतंत्र का अनुभव समान नहीं रहा है। भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था निरंतर बनी रही, जबकि पाकिस्तान में विभिन्न समयों पर सैन्य शासन रहा। नेपाल में राजशाही से लोकतांत्रिक गणराज्य की ओर परिवर्तन हुआ। क्षेत्र के अन्य देशों ने भी अलग-अलग स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास किया।
प्रश्न 12. SAARC का महत्व एवं सीमाएँ बताइए।
SAARC का उद्देश्य दक्षिण एशियाई देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना है। लेकिन सदस्य देशों के बीच राजनीतिक तनाव, विशेषकर भारत-पाकिस्तान संबंधों के मतभेद, संगठन की कार्यक्षमता को कई बार सीमित करते हैं।
अध्याय 4 — अंतर्राष्ट्रीय संगठन
प्रश्न 13. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब और क्यों हुई?
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में हुई। इसका मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, देशों के बीच सहयोग बढ़ाना, संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान में सहायता करना तथा वैश्विक विकास और मानवाधिकारों को बढ़ावा देना है।
प्रश्न 14. सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य कौन-कौन हैं?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन।
प्रश्न 15. वीटो शक्ति क्या है?
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य को किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोकने की विशेष शक्ति वीटो शक्ति कहलाती है।
प्रश्न 16. संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता क्यों है?
संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों को दर्शाती है। वर्तमान विश्व में एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों का महत्व बढ़ चुका है। इसलिए अधिक प्रतिनिधित्व, लोकतांत्रिकता तथा सुरक्षा परिषद के विस्तार के लिए सुधार आवश्यक माना जाता है।
अध्याय 5 — समकालीन विश्व में सुरक्षा
प्रश्न 17. पारंपरिक सुरक्षा से क्या आशय है?
पारंपरिक सुरक्षा मुख्यतः राज्य को बाहरी सैन्य आक्रमण, युद्ध, सीमा विवाद और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़े खतरों से सुरक्षित रखने पर केंद्रित होती है।
प्रश्न 18. गैर-पारंपरिक सुरक्षा के कोई तीन उदाहरण दीजिए।
आतंकवाद, महामारी और पर्यावरणीय संकट गैर-पारंपरिक सुरक्षा के प्रमुख उदाहरण हैं। इनके अतिरिक्त गरीबी, खाद्य संकट और मानव सुरक्षा भी महत्वपूर्ण हैं।
प्रश्न 19. मानव सुरक्षा और राज्य सुरक्षा में अंतर बताइए।
राज्य सुरक्षा का केंद्र राष्ट्र-राज्य, उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता है। मानव सुरक्षा का केंद्र व्यक्ति है। मानव सुरक्षा में बीमारी, गरीबी, भूख, हिंसा और पर्यावरणीय संकट जैसे खतरे भी शामिल होते हैं।
प्रश्न 20. आधुनिक विश्व में सुरक्षा की अवधारणा व्यापक क्यों हुई?
आज आतंकवाद, महामारी, जलवायु परिवर्तन, आर्थिक संकट, गरीबी, खाद्य एवं जल संकट जैसे खतरे भी मानव और समाज को प्रभावित करते हैं। इनमें से अनेक खतरे सीमा पार प्रभाव डालते हैं, इसलिए सुरक्षा केवल सैन्य विषय न रहकर व्यापक मानव एवं वैश्विक सुरक्षा का विषय बन गई है।
अध्याय 6 — पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन
प्रश्न 21. पर्यावरणीय न्याय क्या है?
पर्यावरणीय संसाधनों के लाभ और पर्यावरण संरक्षण की लागत का विभिन्न देशों एवं सामाजिक समूहों में न्यायपूर्ण वितरण पर्यावरणीय न्याय कहलाता है।
प्रश्न 22. सतत विकास क्या है?
ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को प्रभावित न करे, सतत विकास कहलाता है।
प्रश्न 23. पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग क्यों आवश्यक है?
जलवायु परिवर्तन, समुद्री प्रदूषण और वायुमंडलीय संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं रहते। इसलिए देशों के बीच उत्सर्जन नियंत्रण, तकनीकी सहयोग, वित्तीय सहायता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
प्रश्न 24. पर्यावरण के प्रश्न पर विकसित और विकासशील देशों के दृष्टिकोण समझाइए।
विकासशील देश तर्क देते हैं कि औद्योगिक देशों का ऐतिहासिक प्रदूषण और संसाधन उपयोग अधिक रहा है, इसलिए उन पर अधिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। विकासशील देशों को गरीबी हटाने और आर्थिक विकास के लिए संसाधनों की आवश्यकता है। विकसित देश सभी देशों से पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी चाहते हैं। इसलिए न्याय, जिम्मेदारी और विकास के अधिकार का प्रश्न महत्वपूर्ण है।
अध्याय 7 — वैश्वीकरण
प्रश्न 25. वैश्वीकरण क्या है?
विश्व के विभिन्न देशों और समाजों का व्यापार, पूँजी, तकनीक, संचार तथा सांस्कृतिक संपर्कों के माध्यम से अधिक परस्पर जुड़ना वैश्वीकरण कहलाता है।
प्रश्न 26. वैश्वीकरण के प्रमुख कारण लिखिए।
सूचना एवं संचार तकनीक का विकास, परिवहन के साधनों में सुधार, आर्थिक उदारीकरण, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार वैश्वीकरण के प्रमुख कारण हैं।
प्रश्न 27. वैश्वीकरण के सकारात्मक प्रभाव लिखिए।
वैश्वीकरण से विदेशी निवेश, नई तकनीक, व्यापार, नए बाजार और कुछ क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े। देशों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क भी मजबूत हुआ।
प्रश्न 28. वैश्वीकरण की आलोचना के प्रमुख आधार बताइए।
वैश्वीकरण से आर्थिक असमानता बढ़ने, छोटे उत्पादकों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव आने, कुछ क्षेत्रों में रोजगार असुरक्षित होने तथा स्थानीय संस्कृतियों पर बाहरी प्रभाव बढ़ने की आलोचना की जाती है।
अध्याय 8 — राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ
प्रश्न 29. स्वतंत्र भारत के सामने राष्ट्र निर्माण की प्रमुख चुनौतियाँ क्या थीं?
विभाजन और शरणार्थी समस्या, देशी रियासतों का एकीकरण, राष्ट्रीय एकता स्थापित करना, विविधताओं को लोकतांत्रिक व्यवस्था में समायोजित करना तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना प्रमुख चुनौतियाँ थीं।
प्रश्न 30. देशी रियासतों के एकीकरण का महत्व बताइए।
रियासतों के एकीकरण से भारत की राजनीतिक और भौगोलिक एकता मजबूत हुई तथा एक संगठित भारतीय संघ का निर्माण संभव हुआ।
प्रश्न 31. भाषाई राज्यों का निर्माण क्यों किया गया?
विभिन्न भाषाई समुदाय अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप प्रशासनिक व्यवस्था चाहते थे। भाषाई आधार पर राज्यों के गठन से क्षेत्रीय आकांक्षाओं को लोकतांत्रिक ढंग से समायोजित करने में सहायता मिली और भारतीय संघवाद मजबूत हुआ।
प्रश्न 32. भारत में राष्ट्र निर्माण की सफलता के प्रमुख कारण बताइए।
संविधान की स्वीकृति, लोकतांत्रिक संस्थाएँ, संघवाद, चुनावी व्यवस्था, रियासतों का एकीकरण तथा विविधताओं को लोकतांत्रिक ढंग से समायोजित करने की नीति राष्ट्र निर्माण की सफलता के प्रमुख आधार थे।
अध्याय 9 — एक दल के प्रभुत्व का दौर
प्रश्न 33. कांग्रेस के प्रभुत्व के प्रमुख कारण क्या थे?
स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, व्यापक सामाजिक आधार, मजबूत संगठन, लोकप्रिय राष्ट्रीय नेतृत्व और विपक्षी दलों की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति कांग्रेस के प्रभुत्व के प्रमुख कारण थे।
प्रश्न 34. कांग्रेस को व्यापक सामाजिक गठबंधन क्यों कहा जाता है?
कांग्रेस में विभिन्न जातियों, वर्गों, क्षेत्रों, भाषाई समूहों और विचारधाराओं के लोग शामिल थे। इसलिए यह केवल एक सामाजिक समूह का दल न होकर व्यापक सामाजिक आधार वाला राजनीतिक संगठन था।
प्रश्न 35. क्या कांग्रेस का प्रभुत्व लोकतंत्र के विरुद्ध था?
नहीं। भारत में नियमित और प्रतिस्पर्धी चुनाव होते थे, विपक्षी दल मौजूद थे और मतदाता विकल्प चुन सकते थे। इसलिए कांग्रेस का प्रभुत्व लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया के भीतर स्थापित हुआ था।
अध्याय 10 — नियोजित विकास की राजनीति
प्रश्न 36. भारत ने नियोजन को क्यों अपनाया?
स्वतंत्रता के समय भारत में गरीबी, बेरोजगारी, कम औद्योगिक विकास और सीमित संसाधनों की समस्या थी। इसलिए सरकार ने संसाधनों के योजनाबद्ध उपयोग और आर्थिक विकास को दिशा देने के लिए नियोजन अपनाया।
प्रश्न 37. मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है?
जिस अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका प्राप्त हो, उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं।
प्रश्न 38. नियोजित विकास के प्रमुख उद्देश्य बताइए।
आर्थिक विकास को बढ़ाना, गरीबी और बेरोजगारी को कम करना, औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना, क्षेत्रीय असमानता कम करना तथा संसाधनों का संतुलित उपयोग करना इसके प्रमुख उद्देश्य थे।
अध्याय 11 — भारत के विदेश संबंध
प्रश्न 39. भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा, विश्व शांति, स्वतंत्र विदेश नीति, उपनिवेशवाद-विरोध तथा आर्थिक विकास के लिए अनुकूल अंतर्राष्ट्रीय वातावरण बनाना भारत की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य हैं।
प्रश्न 40. पंचशील के पाँच सिद्धांत लिखिए।
पंचशील के पाँच प्रमुख सिद्धांत हैं—एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, आक्रमण न करना, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता एवं पारस्परिक लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
प्रश्न 41. भारत-चीन संबंधों में तनाव के कारण बताइए।
सीमा विवाद, क्षेत्रीय दावे, तिब्बत से संबंधित प्रश्न और आपसी अविश्वास ने भारत-चीन संबंधों में तनाव पैदा किया। 1962 के युद्ध ने संबंधों को और प्रभावित किया।
प्रश्न 42. भारत की गुटनिरपेक्ष नीति का महत्व समझाइए।
गुटनिरपेक्षता ने भारत को शीत युद्ध के दोनों शक्ति गुटों से स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता दी। भारत ने उपनिवेशवाद और नस्लवाद का विरोध किया, विश्व शांति और निरस्त्रीकरण का समर्थन किया तथा विकासशील देशों के सहयोग को बढ़ावा दिया।
अध्याय 12 — कांग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना
प्रश्न 43. 1967 के चुनावों का महत्व बताइए।
1967 में कांग्रेस को कई राज्यों में गंभीर चुनौती मिली और कई गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। इससे कांग्रेस के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व की कमजोरी सामने आई और विपक्षी राजनीति मजबूत हुई।
प्रश्न 44. गैर-कांग्रेसवाद से क्या आशय है?
कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के उद्देश्य से विभिन्न विपक्षी दलों के बीच सहयोग और राजनीतिक एकता की रणनीति को गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति कहा जाता है।
प्रश्न 45. 1969 में कांग्रेस विभाजन का कारण क्या था?
कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक नेतृत्व और इंदिरा गांधी के नेतृत्व के बीच राजनीतिक संघर्ष बढ़ गया। राष्ट्रपति चुनाव सहित कई मुद्दों पर मतभेद गहरे हुए और 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया।
अध्याय 13 — लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट
प्रश्न 46. 1975 के आपातकाल की पृष्ठभूमि क्या थी?
आर्थिक कठिनाइयाँ, महँगाई, बेरोजगारी, राजनीतिक असंतोष और सरकार के विरुद्ध व्यापक आंदोलनों ने परिस्थितियों को तनावपूर्ण बनाया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भी व्यापक राजनीतिक आंदोलन चल रहा था। इन परिस्थितियों के बीच 25 जून 1975 को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया।
प्रश्न 47. आपातकाल के प्रमुख प्रभाव बताइए।
नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाया गया, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं, प्रेस पर नियंत्रण बढ़ा और राजनीतिक विरोध की गतिविधियों पर रोक लगी। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर व्यापक बहस शुरू हुई।
प्रश्न 48. 1977 के चुनाव का महत्व समझाइए।
1977 के चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई और केंद्र में पहली बार कांग्रेस के बाहर की सरकार बनी। इससे यह सिद्ध हुआ कि भारतीय मतदाता सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से बदल सकते हैं और लोकतांत्रिक जवाबदेही महत्वपूर्ण है।
अध्याय 14 — क्षेत्रीय आकांक्षाएँ
प्रश्न 49. क्षेत्रीय आकांक्षा क्या है?
किसी क्षेत्र के लोगों की अपनी भाषा, संस्कृति, पहचान, स्वायत्तता, विकास या राजनीतिक अधिकारों से संबंधित विशेष मांगों को क्षेत्रीय आकांक्षा कहा जाता है।
प्रश्न 50. भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाओं को कैसे समायोजित किया गया?
संघवाद, राज्यों का पुनर्गठन, स्वायत्तता, क्षेत्रीय दलों, राजनीतिक संवाद और विभिन्न समझौतों के माध्यम से क्षेत्रीय आकांक्षाओं को लोकतांत्रिक ढंग से समायोजित किया गया।
प्रश्न 51. उत्तर-पूर्व भारत की प्रमुख राजनीतिक चुनौतियाँ लिखिए।
जातीय एवं सांस्कृतिक विविधता, स्वायत्तता की मांग, अलग राज्य या अलग पहचान की मांग, आर्थिक विकास की समस्याएँ तथा कुछ क्षेत्रों में सशस्त्र आंदोलनों ने उत्तर-पूर्व की राजनीति को प्रभावित किया।
प्रश्न 52. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ राष्ट्रीय एकता को कैसे मजबूत कर सकती हैं?
जब क्षेत्रीय मांगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं, संघवाद, स्वायत्तता और संवाद के माध्यम से स्वीकार किया जाता है तो लोगों में व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ता है। इससे अलगाववादी प्रवृत्तियों को कम करके राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जा सकता है।
अध्याय 15 — भारतीय राजनीति: नए बदलाव
प्रश्न 53. 1989 के बाद भारतीय राजनीति में क्या बदलाव आए?
एकदलीय प्रभुत्व कमजोर हुआ और गठबंधन राजनीति मजबूत हुई। क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ी। सामाजिक न्याय और आरक्षण के प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण बने तथा बहुदलीय प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
प्रश्न 54. मंडल आयोग की राजनीति का महत्व बताइए।
मंडल आयोग की सिफारिशों ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण और सामाजिक न्याय को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। इससे पिछड़े वर्गों की राजनीतिक लामबंदी और प्रतिनिधित्व बढ़ा।
प्रश्न 55. गठबंधन राजनीति की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
गठबंधन राजनीति में अनेक राजनीतिक दल मिलकर सरकार बनाते हैं। इसमें सहमति और समझौते की आवश्यकता होती है। क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ता है और सरकार को विभिन्न दलों के समर्थन को बनाए रखना पड़ता है।
प्रश्न 56. भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका समझाइए।
क्षेत्रीय दल स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति तक पहुँचाते हैं। उन्होंने गठबंधन सरकारों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और केंद्र की राजनीति में संघीय तथा क्षेत्रीय हितों को अधिक महत्व दिलाया।
सभी 15 अध्यायों से 4 अंक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न 57. सोवियत संघ के विघटन ने विश्व राजनीति को कैसे बदला?
सोवियत संघ के विघटन से द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई और शीत युद्ध समाप्त हुआ। अमेरिका का वैश्विक प्रभाव बढ़ा। कई नए स्वतंत्र राष्ट्र बने और पूर्व समाजवादी देशों में आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तन शुरू हुए। इसके बाद विश्व राजनीति में नई शक्ति-समीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई।
प्रश्न 58. संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता समझाइए।
वर्तमान संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के समय की शक्ति-संरचना को अधिक प्रतिबिंबित करती है। वर्तमान में एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों का महत्व बढ़ चुका है। इसलिए सुरक्षा परिषद में व्यापक प्रतिनिधित्व, अधिक लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया तथा बदलती वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप संस्थागत सुधार आवश्यक माना जाता है।
प्रश्न 59. भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।
भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता, पंचशील, विश्व शांति, उपनिवेशवाद-विरोध, राष्ट्रीय संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता प्रमुख रही हैं। भारत ने सैन्य गुटों से दूरी रखते हुए विकासशील देशों के सहयोग और निरस्त्रीकरण का समर्थन किया तथा अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी।
प्रश्न 60. आपातकाल से भारतीय लोकतंत्र को क्या सीख मिली?
आपातकाल ने दिखाया कि लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए केवल चुनाव पर्याप्त नहीं हैं। नागरिक स्वतंत्रता, स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र न्यायपालिका, विपक्ष की प्रभावी भूमिका और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता भी आवश्यक है। 1977 के चुनाव ने जनता की लोकतांत्रिक शक्ति को पुनः स्थापित किया।
प्रश्न 61. क्षेत्रीय आकांक्षाओं का लोकतांत्रिक समाधान कैसे किया जा सकता है?
क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान संघवाद, संवाद, स्वायत्तता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, राज्यों के पुनर्गठन, आर्थिक विकास और संवैधानिक समझौतों के माध्यम से किया जा सकता है। लोकतंत्र का उद्देश्य विविधताओं को दबाना नहीं बल्कि उन्हें राजनीतिक व्यवस्था में समायोजित करना है।
प्रश्न 62. 1989 के बाद भारतीय राजनीति को परिवर्तन का दौर क्यों कहा जाता है?
1989 के बाद कांग्रेस का दीर्घकालीन प्रभुत्व कमजोर हुआ, गठबंधन राजनीति मजबूत हुई, क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ी, मंडल के कारण सामाजिक न्याय की राजनीति प्रमुख बनी तथा बहुदलीय प्रतिस्पर्धा का विस्तार हुआ। इस अवधि ने भारतीय राजनीति को अधिक बहुकेंद्रीय और प्रतिस्पर्धी बनाया।
अध्याय 1 से 15 — अंतिम 30 अति महत्वपूर्ण प्रश्न
| क्र. | अध्याय | अति महत्वपूर्ण प्रश्न |
| 1 | दो ध्रुवीयता का अंत | सोवियत संघ के विघटन के कारण एवं परिणाम |
| 2 | सत्ता के समकालीन केन्द्र | चीन और यूरोपीय संघ का उदय |
| 3 | समकालीन दक्षिण एशिया | भारत-पाक संबंध एवं SAARC |
| 4 | अंतर्राष्ट्रीय संगठन | संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता |
| 5 | समकालीन विश्व में सुरक्षा | पारंपरिक एवं गैर-पारंपरिक सुरक्षा |
| 6 | पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन | पर्यावरणीय न्याय एवं सतत विकास |
| 7 | वैश्वीकरण | वैश्वीकरण के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव |
| 8 | राष्ट्र निर्माण | स्वतंत्र भारत की राष्ट्र निर्माण चुनौतियाँ |
| 9 | एक दल का प्रभुत्व | कांग्रेस के प्रभुत्व के कारण |
| 10 | नियोजित विकास | मिश्रित अर्थव्यवस्था एवं नियोजन |
| 11 | भारत के विदेश संबंध | गुटनिरपेक्षता एवं पंचशील |
| 12 | कांग्रेस प्रणाली | 1967 और 1969 की घटनाएँ |
| 13 | लोकतांत्रिक संकट | आपातकाल एवं 1977 चुनाव |
| 14 | क्षेत्रीय आकांक्षाएँ | क्षेत्रीय आकांक्षाओं का लोकतांत्रिक समाधान |
| 15 | नए बदलाव | मंडल, गठबंधन एवं क्षेत्रीय दल |
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अंतिम परीक्षा रणनीति: अध्याय 1 से 15 सभी अध्यायों को समान रूप से कवर करें। 7 अंक वाले अध्यायों से 2, 3 और 4 अंक के उत्तर लिखने का अभ्यास विशेष रूप से करें। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के लिए तिथियाँ, नाम, संगठन, नीतियाँ और प्रमुख अवधारणाएँ दोहराएँ।
अतिरिक्त वस्तुनिष्ठ अभ्यास
सही विकल्प
- गैर-पारंपरिक सुरक्षा का उदाहरण है— महामारी
- मानव सुरक्षा का केंद्र है— व्यक्ति
- पर्यावरणीय न्याय संबंधित है— पर्यावरणीय लाभ और लागत के न्यायपूर्ण वितरण से
- वैश्वीकरण का प्रमुख साधन है— सूचना एवं संचार तकनीक
- भारत के सामने स्वतंत्रता के समय प्रमुख चुनौती थी— राष्ट्रीय एकीकरण
- 1967 के बाद मजबूत हुई— गैर-कांग्रेसी राजनीति
- मिश्रित अर्थव्यवस्था में होते हैं— सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र
- भारत की विदेश नीति का प्रमुख सिद्धांत था— गुटनिरपेक्षता
- आपातकाल घोषित हुआ— 25 जून 1975
- सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया— जयप्रकाश नारायण ने
- क्षेत्रीय आकांक्षाएँ संबंधित हैं— पहचान और स्वायत्तता से
- मंडल आयोग संबंधित है— पिछड़े वर्गों से
रिक्त स्थान — उत्तर सहित
- मानव सुरक्षा का केंद्र ________ है। — व्यक्ति
- सतत विकास में वर्तमान के साथ ________ पीढ़ियों का ध्यान रखा जाता है। — भविष्य की
- वैश्वीकरण में ________ तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका है। — सूचना एवं संचार
- भारत ने स्वतंत्रता के समय ________ अर्थव्यवस्था अपनाई। — मिश्रित
- 1969 में कांग्रेस में ________ हुआ। — विभाजन
- आपातकाल ________ 1975 को घोषित हुआ। — 25 जून
- 1989 के बाद ________ राजनीति मजबूत हुई। — गठबंधन
सत्य / असत्य — उत्तर सहित
- गैर-पारंपरिक सुरक्षा केवल सैन्य खतरों तक सीमित है। — असत्य
- पर्यावरणीय समस्याएँ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की मांग करती हैं। — सत्य
- भारत ने शीत युद्ध में सैन्य गुट की सदस्यता ली थी। — असत्य
- 1967 में कांग्रेस को कई राज्यों में चुनौती मिली। — सत्य
- 1977 में जनता पार्टी सत्ता में आई। — सत्य
- क्षेत्रीय आकांक्षाएँ हमेशा राष्ट्र-विरोधी होती हैं। — असत्य
- गठबंधन राजनीति में अनेक दलों की भूमिका होती है। — सत्य
सही जोड़ी
| कॉलम A | कॉलम B |
| 1. मानव सुरक्षा | व्यक्ति की सुरक्षा |
| 2. सतत विकास | भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं का ध्यान |
| 3. मिश्रित अर्थव्यवस्था | सार्वजनिक + निजी क्षेत्र |
| 4. 1975 | आपातकाल |
| 5. जयप्रकाश नारायण | सम्पूर्ण क्रांति |
| 6. मंडल आयोग | सामाजिक न्याय / पिछड़ा वर्ग |
| 7. गठबंधन राजनीति | बहुदलीय सरकार |
एक वाक्य में उत्तर
- मानव सुरक्षा क्या है? — व्यक्ति को विभिन्न गंभीर खतरों से सुरक्षित रखने की अवधारणा।
- सतत विकास क्या है? — वर्तमान विकास के साथ भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं की रक्षा करना।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था क्या है? — सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों वाली अर्थव्यवस्था।
- गुटनिरपेक्षता क्या है? — सैन्य गुटों से स्वतंत्र विदेश नीति।
- आपातकाल कब लगा? — 25 जून 1975।
- सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किसने किया? — जयप्रकाश नारायण।
- मंडल आयोग किससे संबंधित था? — सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों से।
- गठबंधन सरकार क्या है? — दो या अधिक राजनीतिक दलों द्वारा मिलकर बनाई गई सरकार।
4 अंक के अत्यंत महत्वपूर्ण मॉडल प्रश्न — अध्याय 5 से 15
प्रश्न 1. पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा का तुलनात्मक वर्णन कीजिए।
पारंपरिक सुरक्षा मुख्यतः राज्य, सीमा, संप्रभुता और सैन्य आक्रमण से संबंधित है। गैर-पारंपरिक सुरक्षा में आतंकवाद, महामारी, गरीबी, पर्यावरणीय संकट और मानव सुरक्षा जैसे विषय शामिल हैं। पारंपरिक सुरक्षा का केंद्र राज्य है जबकि गैर-पारंपरिक सुरक्षा में व्यक्ति और समाज को भी केंद्र में रखा जाता है।
प्रश्न 2. पर्यावरणीय राजनीति में विकसित और विकासशील देशों के मतभेद समझाइए।
विकासशील देश मानते हैं कि औद्योगिक क्रांति और ऐतिहासिक उत्सर्जन में विकसित देशों का योगदान अधिक रहा है। वे विकास के लिए संसाधनों के उपयोग और तकनीकी एवं वित्तीय सहायता की मांग करते हैं। विकसित देश सभी देशों से पर्यावरण संरक्षण में भागीदारी चाहते हैं। इसलिए समानता, जिम्मेदारी और विकास के अधिकार के प्रश्नों पर मतभेद दिखाई देते हैं।
प्रश्न 3. भारत के राष्ट्र निर्माण की प्रमुख चुनौतियों की व्याख्या कीजिए।
विभाजन और शरणार्थी समस्या, देशी रियासतों का एकीकरण, भाषाई और सांस्कृतिक विविधताओं का समायोजन तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना प्रमुख चुनौतियाँ थीं। भारतीय संविधान, संघवाद, लोकतांत्रिक संस्थाओं और राजनीतिक संवाद के माध्यम से इन चुनौतियों का समाधान करने का प्रयास किया गया।
प्रश्न 4. भारत की विदेश नीति की प्रमुख विशेषताओं को समझाइए।
भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता, पंचशील, विश्व शांति, उपनिवेशवाद और नस्लवाद का विरोध, राष्ट्रीय संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता प्रमुख रहे हैं। भारत ने शीत युद्ध के दौरान किसी सैन्य गुट में शामिल होने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई और विकासशील देशों के सहयोग का समर्थन किया।
प्रश्न 5. आपातकाल के प्रभाव और 1977 के चुनाव का महत्व समझाइए।
आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध, प्रेस पर नियंत्रण और विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियाँ हुईं। 1977 के चुनाव में जनता ने सत्ता परिवर्तन करके लोकतांत्रिक जवाबदेही की शक्ति दिखाई। पहली बार केंद्र में कांग्रेस के बाहर की सरकार बनी। इस घटना ने लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों के महत्व को स्पष्ट किया।
प्रश्न 6. क्षेत्रीय आकांक्षाओं के लोकतांत्रिक समाधान को समझाइए।
क्षेत्रीय आकांक्षाओं को संवाद, संघवाद, स्वायत्तता, आर्थिक विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से समायोजित किया जा सकता है। क्षेत्रीय दल और लोकतांत्रिक संस्थाएँ स्थानीय मांगों को राष्ट्रीय राजनीति तक पहुँचाते हैं। क्षेत्रीय पहचान का सम्मान करने से अलगाववादी प्रवृत्तियों को कम किया जा सकता है और राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है।
प्रश्न 7. 1989 के बाद भारतीय राजनीति में हुए प्रमुख बदलाव समझाइए।
1989 के बाद एकदलीय प्रभुत्व कमजोर हुआ और गठबंधन राजनीति मजबूत हुई। क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा। मंडल आयोग की सिफारिशों के कारण सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों की राजनीति महत्वपूर्ण हुई। भाजपा एक प्रमुख राष्ट्रीय शक्ति के रूप में उभरी और भारतीय राजनीति अधिक बहुदलीय तथा प्रतिस्पर्धी हुई।
कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान — अंतिम रिवीजन चार्ट
| अध्याय | अवश्य दोहराएँ |
| 5. समकालीन विश्व में सुरक्षा | पारंपरिक सुरक्षा, गैर-पारंपरिक सुरक्षा, मानव सुरक्षा, आतंकवाद |
| 6. पर्यावरण | पर्यावरणीय न्याय, वैश्विक संपदा, सतत विकास, संसाधन राजनीति |
| 7. वैश्वीकरण | अर्थ, कारण, आर्थिक/राजनीतिक/सांस्कृतिक प्रभाव |
| राष्ट्र निर्माण | विभाजन, रियासतें, भाषाई राज्य, राष्ट्रीय एकता |
| एक दल का प्रभुत्व | कांग्रेस प्रभुत्व, कारण, विपक्ष |
| नियोजित विकास | नियोजन, योजना आयोग, मिश्रित अर्थव्यवस्था |
| भारत के विदेश संबंध | गुटनिरपेक्षता, पंचशील, चीन, पाकिस्तान, परमाणु नीति |
| कांग्रेस प्रणाली | 1967, गैर-कांग्रेसवाद, 1969 विभाजन, 1971 |
| लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट | जेपी आंदोलन, सम्पूर्ण क्रांति, 1975 आपातकाल, 1977 चुनाव |
| क्षेत्रीय आकांक्षाएँ | पंजाब, जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व, क्षेत्रीय दल |
| नए बदलाव | 1989, मंडल, भाजपा, गठबंधन राजनीति, क्षेत्रीय दल |
परीक्षा में उत्तर लेखन: 2 अंक के उत्तर में परिभाषा + 2 मुख्य बिंदु, 3 अंक में संक्षिप्त परिचय + 3 बिंदु तथा 4 अंक में परिचय + कारण/विशेषताएँ + प्रभाव + निष्कर्ष लिखें। जहाँ संभव हो वहाँ वर्ष, घटना, नेता और प्रमुख अवधारणा का उल्लेख करें।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस पोस्ट में उपलब्ध कराई गई अंक योजना, पाठ्यक्रम एवं अध्ययन सामग्री माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश (MPBSE) के आधिकारिक दिशा-निर्देशों एवं सत्र 2026-27 के शैक्षणिक प्रारूप पर आधारित है। यह सामग्री केवल विद्यार्थियों के स्व-अध्ययन, परीक्षा पूर्व अभ्यास और मार्गदर्शन हेतु तैयार की गई है। परीक्षा से संबंधित किसी भी आधिकारिक संशोधन, तिथि अथवा दिशा-निर्देश के लिए माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म.प्र. की आधिकारिक वेबसाइट (mpbse.nic.in) पर जारी सूचना को ही अंतिम रूप से प्रामाणिक माना जाए।