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कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान नोट्स : MP Board Class 12th Political Science Blueprint, Notes & Important Questions 2026-27

MP Board Class 12th Political Science Blueprint, Notes & Important Questions 2026-27 | कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान नोट्स एवं अंक योजना

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माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश (MPBSE) सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान (भाग 1 एवं 2) की नवीन अंक योजना, AI-संचालित सरल नोट्स, समसामयिक विश्लेषणात्मक प्रश्नोत्तर और मॉडल पेपर यहाँ से देखें।

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माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म.प्र. (MPBSE) सत्र 2026-27: कक्षा 12वीं [विषय: राजनीति विज्ञान] अध्ययन सामग्री

माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 12वीं बोर्ड परीक्षा की आधिकारिक अंक योजना (Blueprint) जारी कर दी गई है। राजनीति विज्ञान में समकालीन वैश्विक राजनीति और स्वतंत्र भारत के राजनीतिक घटनाक्रमों का विश्लेषणात्मक अध्ययन आवश्यक होता है। सटीक उत्तर लेखन और अवधारणात्मक स्पष्टता से विद्यार्थी इस विषय में उत्कृष्ट अंक अर्जित कर सकते हैं।

विद्यार्थियों और शिक्षकों की सुविधा के लिए यहाँ कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान (भाग 1: समकालीन विश्व राजनीति एवं भाग 2: स्वतंत्र भारत में राजनीति) की अद्यतन अंक योजना पर आधारित AI-असिस्टेड सरल नोट्स, महत्वपूर्ण अवधारणाएँ एवं परीक्षा-उपयोगी अभ्यास प्रश्नोत्तर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

इस अध्ययन सामग्री की मुख्य विशेषताएँ

  • नवीनतम ब्लूप्रिंट आधारित: 1, 2, 3 एवं 4 अंक वाले प्रश्नों का बोर्ड पैटर्न के अनुसार सटीक विभाजन।
  • संकल्पनात्मक एवं विश्लेषणात्मक नोट्स: वैश्विक संधियों, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, भारतीय संविधान के प्रमुख अनुच्छेदों तथा ऐतिहासिक नीतिगत निर्णयों की सरल बिंदुवार व्याख्या।
  • समसामयिक एवं कार्टून/केस-आधारित प्रश्न: राजनीति विज्ञान की NCERT पाठ्यपुस्तक के प्रमुख कार्टूनों और केस स्टडीज पर आधारित संभावित प्रश्नोत्तर।

कक्षा 12वीं राजनीति विज्ञान

सम्पूर्ण सरल नोट्स एवं अभ्यास प्रश्नोत्तर

माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश, भोपाल | हायर सेकेण्डरी परीक्षा सत्र 2026-27

पूर्णांक — 80 | समय — 3:00 घंटे

अंक योजना — एक नजर में

भागअध्यायआवंटित अंक
भाग-1
समकालीन विश्व राजनीति
1. दो ध्रुवीयता का अंत07
2. सत्ता के समकालीन केन्द्र06
3. समकालीन दक्षिण एशिया05
4. अंतर्राष्ट्रीय संगठन07
5. समकालीन विश्व में सुरक्षा05
6. पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन06
7. वैश्वीकरण04
भाग-2
स्वतंत्र भारत में राजनीति
1. राष्ट्र निर्माण की चुनौतियाँ06
2. एक दल के प्रभुत्व का दौर03
3. नियोजित विकास की राजनीति03
4. भारत के विदेश संबंध07
5. कांग्रेस प्रणाली — चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना03
6. लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट07
7. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ07
8. भारतीय राजनीति — नए बदलाव04
कुल80
सबसे अधिक अंक वाले अध्याय: दो ध्रुवीयता का अंत, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, भारत के विदेश संबंध, लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट तथा क्षेत्रीय आकांक्षाएँ — 7-7 अंक।

परीक्षा प्रश्न संरचना

प्रश्नप्रकारकुल प्रश्नप्रति प्रश्नकुल अंक
1सही विकल्प06106
2रिक्त स्थान06106
3सत्य/असत्य06106
4सही जोड़ी07107
5एक वाक्य में उत्तर07107
6–15लघु उत्तरीय10220
16–19मध्यम उत्तरीय04312
20–23दीर्घ उत्तरीय04416
कुल वस्तुनिष्ठ प्रश्न: 32 | 2 अंक: 10 प्रश्न | 3 अंक: 4 प्रश्न | 4 अंक: 4 प्रश्न

भाग-1 : समकालीन विश्व राजनीति

अध्याय 1 — दो ध्रुवीयता का अंत (07 अंक)

1. दो ध्रुवीय विश्व क्या था?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व राजनीति मुख्यतः दो महाशक्तियों—संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ—के आसपास विभाजित हो गई। इसे दो ध्रुवीय व्यवस्था कहा गया।

2. शीत युद्ध

अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक, राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को शीत युद्ध कहा गया। दोनों महाशक्तियाँ सीधे व्यापक युद्ध से बचते हुए प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने का प्रयास करती थीं।

3. सोवियत संघ की विशेषताएँ

  • समाजवादी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था
  • राज्य के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था
  • एक-दलीय राजनीतिक व्यवस्था
  • विशाल सैन्य शक्ति
  • पूर्वी यूरोप में प्रभाव

4. गोर्बाचेव

मिखाइल गोर्बाचेव 1985 में सोवियत संघ के नेता बने। उन्होंने पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त जैसी नीतियाँ अपनाईं। इनका उद्देश्य सोवियत व्यवस्था में सुधार लाना था।

5. सोवियत संघ का विघटन

1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ। इससे दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई और संयुक्त राज्य अमेरिका प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा।

6. दो ध्रुवीयता के अंत के परिणाम

  • शीत युद्ध समाप्त हुआ।
  • सोवियत संघ विघटित हुआ।
  • अनेक नए स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए।
  • अमेरिका का वैश्विक प्रभाव बढ़ा।
  • विश्व राजनीति में नई शक्ति-समीकरण की शुरुआत हुई।

7. शॉक थेरेपी

सोवियत संघ के विघटन के बाद कई समाजवादी देशों ने तेज़ी से बाजार अर्थव्यवस्था अपनाने का प्रयास किया। इस आर्थिक संक्रमण को सामान्यतः शॉक थेरेपी कहा जाता है।

2 अंक प्रश्न — उत्तर सहित

प्रश्न 1. दो ध्रुवीयता से क्या आशय है?
दो ध्रुवीयता से आशय ऐसी विश्व व्यवस्था से है जिसमें दो प्रमुख महाशक्तियाँ वैश्विक राजनीति को प्रभावित करती थीं। शीत युद्ध के समय अमेरिका और सोवियत संघ इसके दो प्रमुख ध्रुव थे।
प्रश्न 2. पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त क्या थे?
पेरेस्त्रोइका आर्थिक और राजनीतिक पुनर्गठन की नीति थी, जबकि ग्लासनोस्त अधिक खुलापन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी नीति थी। दोनों नीतियाँ मिखाइल गोर्बाचेव ने सोवियत संघ में अपनाईं।
प्रश्न 3. सोवियत संघ के विघटन का एक प्रमुख परिणाम बताइए।
सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध और दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हुई तथा संयुक्त राज्य अमेरिका का वैश्विक प्रभाव और बढ़ गया।

3 अंक प्रश्न — उत्तर सहित

प्रश्न. सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण बताइए।
सोवियत अर्थव्यवस्था में लंबे समय से ठहराव, राजनीतिक केंद्रीकरण, आर्थिक अक्षमता, विभिन्न गणराज्यों में राष्ट्रवादी भावनाओं का बढ़ना और सुधारों से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता प्रमुख कारण थे। गोर्बाचेव की सुधार नीतियों ने व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप केंद्रीय नियंत्रण कमजोर हुआ और अंततः 1991 में संघ का विघटन हो गया।

4 अंक प्रश्न — उत्तर सहित

प्रश्न. सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व राजनीति में हुए प्रमुख परिवर्तनों को समझाइए।
सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध की समाप्ति हुई और दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था खत्म हो गई। कई नए स्वतंत्र गणराज्य अस्तित्व में आए। संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा। पूर्वी यूरोप में राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन हुए तथा कई देशों ने बाजार आधारित व्यवस्था अपनाई। वैश्विक राजनीति में एकध्रुवीयता के साथ-साथ बाद में नई क्षेत्रीय एवं आर्थिक शक्तियों के उभरने की प्रक्रिया भी शुरू हुई।

महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ तथ्य

  1. सोवियत संघ का विघटन — 1991
  2. गोर्बाचेव की प्रमुख सुधार नीतियाँ — पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त
  3. शीत युद्ध के दो प्रमुख ध्रुव — अमेरिका और सोवियत संघ
शिक्षा • अध्ययन • परीक्षा तैयारी के लिए विजिट कीजिये

अध्याय 2 — सत्ता के समकालीन केन्द्र (06 अंक)

1. समकालीन शक्ति केन्द्र

शीत युद्ध के बाद विश्व में केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि आर्थिक, तकनीकी, राजनीतिक और क्षेत्रीय शक्ति भी महत्वपूर्ण हो गई। यूरोपीय संघ, चीन और जापान जैसे शक्ति केन्द्र उभरे।

2. यूरोपीय संघ

यूरोपीय संघ यूरोपीय देशों का एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। इसका उद्देश्य आर्थिक और राजनीतिक सहयोग बढ़ाना है। इसकी साझा संस्थाएँ और कई मामलों में साझा नीतियाँ हैं।

3. चीन का उदय

चीन ने आर्थिक सुधारों और खुलेपन की नीतियों के माध्यम से तेजी से आर्थिक विकास किया। उसने विश्व अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत की।

4. जापान

जापान एक विकसित औद्योगिक और तकनीकी शक्ति है। आर्थिक क्षमता, तकनीक और निवेश के कारण उसका वैश्विक महत्व है।

5. ASEAN

ASEAN दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन है जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है।

2 अंक प्रश्न

प्रश्न 1. यूरोपीय संघ क्या है?
यूरोपीय संघ यूरोपीय देशों का क्षेत्रीय संगठन है जो आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देता है। यह विश्व राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र है।
प्रश्न 2. चीन के उदय का एक कारण बताइए।
चीन के आर्थिक सुधारों और खुलेपन की नीतियों से उत्पादन, व्यापार और विदेशी निवेश में वृद्धि हुई, जिससे चीन एक प्रमुख वैश्विक आर्थिक शक्ति बना।

3 अंक प्रश्न

प्रश्न. यूरोपीय संघ की शक्ति के प्रमुख आधार बताइए।
यूरोपीय संघ की शक्ति का आधार उसका विशाल साझा बाजार, आर्थिक समृद्धि, तकनीकी क्षमता, विकसित संस्थाएँ और सदस्य देशों की सामूहिक राजनीतिक भूमिका है। कई क्षेत्रों में सामूहिक निर्णय लेने से उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रभाव क्षमता बढ़ती है।

4 अंक प्रश्न

प्रश्न. चीन को समकालीन शक्ति केन्द्र के रूप में समझाइए।
चीन ने आर्थिक सुधारों के बाद तेज औद्योगिकीकरण और निर्यात-आधारित विकास हासिल किया। विशाल जनसंख्या और बाजार, विनिर्माण क्षमता, तकनीकी विकास तथा विदेशी निवेश ने उसकी आर्थिक शक्ति बढ़ाई। इसके साथ चीन ने कूटनीतिक और सैन्य क्षमता भी विकसित की। आज वह एशिया तथा विश्व राजनीति में महत्वपूर्ण शक्ति है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा वैश्विक व्यापार में उसकी भूमिका लगातार बढ़ी है।
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अध्याय 3 — समकालीन दक्षिण एशिया (05 अंक)

1. दक्षिण एशिया

दक्षिण एशिया में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव जैसे देश शामिल माने जाते हैं। क्षेत्र में विविध राजनीतिक व्यवस्थाएँ और लंबे समय से चले आ रहे विवाद हैं।

2. भारत-पाकिस्तान संबंध

कश्मीर, सीमा विवाद, आतंकवाद और जल जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया है। समय-समय पर बातचीत और शांति प्रयास भी हुए हैं।

3. लोकतंत्र और सैन्य शासन

भारत और कुछ अन्य दक्षिण एशियाई देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ विकसित हुईं, जबकि पाकिस्तान में विभिन्न समयों पर सैन्य शासन रहा।

4. श्रीलंका

श्रीलंका में सिंहली और तमिल समुदायों के बीच संघर्ष ने लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता पैदा की। LTTE से संबंधित संघर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा।

5. क्षेत्रीय सहयोग — SAARC

SAARC दक्षिण एशियाई देशों के क्षेत्रीय सहयोग का संगठन है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग और विकास को बढ़ावा देना है।

2 अंक प्रश्न

प्रश्न 1. SAARC क्या है?
SAARC दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन है। इसका उद्देश्य दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाना है।
प्रश्न 2. भारत-पाकिस्तान संबंधों में प्रमुख विवाद कौन-सा है?
कश्मीर विवाद भारत-पाकिस्तान संबंधों का प्रमुख विवाद रहा है। इसके अतिरिक्त आतंकवाद, सीमा और जल संबंधी मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।

3 अंक प्रश्न

प्रश्न. दक्षिण एशिया में लोकतंत्र के विकास की स्थिति समझाइए।
दक्षिण एशिया में लोकतंत्र का अनुभव एक जैसा नहीं रहा। भारत में लोकतंत्र निरंतर बना रहा, जबकि पाकिस्तान में सैन्य शासन के दौर आए। नेपाल में राजशाही से लोकतांत्रिक गणराज्य की ओर परिवर्तन हुआ और अन्य देशों में भी लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास अलग-अलग गति से हुआ।

4 अंक प्रश्न

प्रश्न. दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता क्यों है?
दक्षिण एशियाई देशों में भौगोलिक निकटता, समान ऐतिहासिक अनुभव और आर्थिक तथा सामाजिक समस्याएँ हैं। आतंकवाद, गरीबी, जल, पर्यावरण, व्यापार और स्वास्थ्य जैसी समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग आवश्यक है। SAARC जैसे मंच क्षेत्रीय संवाद और सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं। हालांकि राजनीतिक विवाद और आपसी अविश्वास कई बार क्षेत्रीय सहयोग को सीमित करते हैं।
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अध्याय 4 — अंतर्राष्ट्रीय संगठन (07 अंक)

1. अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का महत्व

अंतर्राष्ट्रीय संगठन देशों को संवाद, सहयोग और सामूहिक समस्या-समाधान का मंच प्रदान करते हैं।

2. संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में हुई। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, देशों के बीच सहयोग बढ़ाना और मानवाधिकारों को बढ़ावा देना है।

3. संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख संस्थाएँ

  • महासभा
  • सुरक्षा परिषद
  • आर्थिक और सामाजिक परिषद
  • अंतरराष्ट्रीय न्यायालय
  • सचिवालय
  • न्यासी परिषद

4. सुरक्षा परिषद

सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन। स्थायी सदस्यों के पास वीटो अधिकार है।

5. संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी संरचना आज के वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह नहीं दर्शाती। भारत सहित कई देश सुरक्षा परिषद में व्यापक प्रतिनिधित्व और सुधार की माँग करते रहे हैं।

6. अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ

विश्व बैंक, IMF, WTO आदि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

2 अंक प्रश्न

प्रश्न 1. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई?
उत्तर: 1945 में।
प्रश्न 2. सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य कौन हैं?
उत्तर: अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन।
प्रश्न 3. वीटो क्या है?
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य को किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोकने की विशेष शक्ति को वीटो अधिकार कहा जाता है।

3 अंक प्रश्न

प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता क्यों है?
संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों पर आधारित है। आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भूमिका बढ़ गई है। इसलिए अधिक प्रतिनिधित्व, लोकतांत्रिकता और निर्णय प्रक्रिया में सुधार आवश्यक माना जाता है। भारत जैसे देश सुरक्षा परिषद के विस्तार की माँग करते हैं।

4 अंक प्रश्न

प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र के महत्व का वर्णन कीजिए।
संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने का प्रमुख वैश्विक मंच है। यह देशों को संवाद और विवाद समाधान का अवसर देता है। शांति स्थापना अभियानों, मानवाधिकारों, स्वास्थ्य, विकास, शरणार्थी सहायता तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। विभिन्न विशेषीकृत संस्थाओं के माध्यम से यह सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर भी काम करता है। हालांकि उसकी प्रभावशीलता कई बार शक्तिशाली देशों के हितों और सुरक्षा परिषद की संरचना से प्रभावित होती है।
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अध्याय 5 — समकालीन विश्व में सुरक्षा (05 अंक)

1. सुरक्षा का अर्थ

किसी देश या व्यक्ति को गंभीर खतरों से सुरक्षित रखना सुरक्षा कहलाता है। पारंपरिक सुरक्षा मुख्यतः सैन्य खतरों पर केंद्रित थी, जबकि अब सुरक्षा की अवधारणा व्यापक हो गई है।

2. पारंपरिक सुरक्षा

सैन्य आक्रमण, सीमा सुरक्षा, शक्ति संतुलन और युद्ध जैसी चुनौतियाँ पारंपरिक सुरक्षा से संबंधित हैं।

3. गैर-पारंपरिक सुरक्षा

परीक्षा-उपयोगी प्रश्न बैंक:

  • o वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ / रिक्त स्थान / सही जोड़ी / सत्य-असत्य): 1 अंक वाले सभी महत्वपूर्ण तथ्य।
  • o अति लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक): 30 शब्दों में प्रमुख राजनीतिक शब्दावलियों एवं घटनाओं की परिभाषा।
  • o लघु उत्तरीय प्रश्न (3 अंक): 75 शब्दों में कारणों, प्रभावों एवं तुलनात्मक मुद्दों पर केंद्रित।
  • o दीर्घ उत्तरीय / निबंधात्मक प्रश्न (4 अंक): 120 शब्दों में विस्तृत विवेचना और आलोचनात्मक मूल्यांकन।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण (Disclaimer): इस पोस्ट में उपलब्ध कराई गई अंक योजना, पाठ्यक्रम एवं अध्ययन सामग्री माध्यमिक शिक्षा मण्डल, मध्यप्रदेश (MPBSE) के आधिकारिक दिशा-निर्देशों एवं सत्र 2026-27 के शैक्षणिक प्रारूप पर आधारित है। यह सामग्री केवल विद्यार्थियों के स्व-अध्ययन, परीक्षा पूर्व अभ्यास और मार्गदर्शन हेतु तैयार की गई है। परीक्षा से संबंधित किसी भी आधिकारिक संशोधन, तिथि अथवा दिशा-निर्देश के लिए माध्यमिक शिक्षा मण्डल, म.प्र. की आधिकारिक वेबसाइट (mpbse.nic.in) पर जारी सूचना को ही अंतिम रूप से प्रामाणिक माना जाए।

 

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